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बच्चों को बच्चा ही रहने दें !
पिछले कुछ समय से देशभर में बच्चों की सुसाइड रेट बढ़ रही है। मुंबई में एक ही दिन तीन मासूमों ने खुद का जीवन खत्म कर लिया। आखिर यह सिलसिला क्यों चल निकला है, सोचना जरूरी है। विशेषज्ञों की मानें तो पेरेंट्स के मोरल प्रेशर, पीयर ग्रुप पे्रशर और सेल्फ होप इन सब का प्रेशर बच्चों के मन पर पड़ने पर ही बच्चे इस तरह का निर्णय ले लेते हैं। बच्चों का बचपन खत्म होता जा रहा है। मासूमों के इस निर्णय के लिए कोई ओर नहीं सिर्फ पेरेंट्स ही जिम्मेदार होते हैं।
कैरेक्टर बिल्डिंग एज में दें ध्यान
एसएमएस मेडिकल कॉलेज के साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रदीप शर्मा का कहना है कि बच्चों में 8 से 17 साल की उम्र कैरेक्टर बिल्डिंग एज कहलाती है। इस समय बच्चे बहुत ही फलेक्सिबल होते हैं। उनमें कई इमोशनल, बायोलॉजिकल और हार्मोनल चेंज आते हैं। इस वजह से बच्चों को इस पड़ाव में पेरेंट्स के सपोर्ट की बहुत जरूरत होती है। अगर उन्हें यह सपोर्ट नहीं मिलता तो इसका नेगेटिव इफेक्ट उनके मन और शरीर दोनों पर ही पड़ता है। विशेष्ाज्ञों का मानना है कि आज पेरेंट्स के बच्चों को टाइम नहीं देने के कारण बच्चे अधिकांश समय टीवी देखते हुए बीता रहे हैं। इस माध्यम से वो बहुत कुछ ऎसा सीख रहे हैं, जो इन्हें नहीं सीखना चाहिए।
पेरेंट्स हुए बिजी
पिछले कुछ समय से माता-पिता दोनों के जॉब करने का चलन बढ़ा है। इसका खामियाजा कहीं न कहीं बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। समाजशास्त्री सोहन लाल शर्मा का कहना है कि बच्चों के मन को समझना बहुत ही मुश्किल होता है। एक समय था जब बालमन को पेरेंट्स आसानी से समझ लेते थे, लेकिन आज वो भी खुद के कामो में ही इतना उलझ जाते हैं कि बच्चे के मन को समझने का न तो उनके पास वक्त होता है और न ही उसे समझने की इच्छा। आज एकल परिवार होने की वजह से भी बच्चे सिर्फ टीवी और दोस्तों के साथ ही समय बिता पाते हैं। आज स्थिति यह है कि बच्चों को घर के सदस्यों के साथ समय बिताने का मौका सप्ताह में एक या दो दिन ही मिल पाता है। यही कारण है कि बच्चों के मन में जब कोई गलत भावनाएं आती हैं तो वे उन भावनाओं के साथ ही जीने लगते हैं। जब यह भावनाएं बढ़ती हैं, तो वे डिप्रेशन-सुसाइड तक का रास्ता अपना लेते हैं।
बच्चों को समझना सीखें
प्राइमरी क्लास के स्टूडेंट्स को पढ़ा रही मोना खंडेलवाल ने बताया बच्चों की बातों और उनके नेचर को नोटिस करने से पता चलता है कि उनपर रियलिटी शो का कितना गलत असर पढ़ रहा है। कई बच्चे चाइल्ड आर्टिस्ट से खूद को कम्पेयर करते है और निराश हो जाते हैं। उन्हें इन भावनाओं से बाहर निकालने के लिए जरूरी है कि पेरेंट्स उन्हें समझे। बच्चों का जब रिजल्ट बिगड़ता है तो वो कम नंबर से दुखी नहीं होते बल्कि पेरेंट्स का रिएक्शन क्या होगा, इससे डर जाते हैं।
विजुअल मीडिया का असर
सीबीएसई गवर्निग बॉडी के मैम्बर अशोक गुप्ता का कहना है कि बच्चों पर विजुअल मीडिया गहरा इफेक्ट छोड़ता है। अगर बच्चा टीवी या मूवी में कोई नई चीज देखता है, तो उसकी चर्चा वो एक सप्ताह तक अपने पीयर ग्रुप में करता हुआ मिलता है। बच्चे कई बार जो टीवी पर देखते हैं, उसे अपनी लाइफ में करने की कोशिश भी करते हैं। यह एक इन मैच्योर बिहेव होता है। लेकिन पेरेंट्स इस बिहेव को किस तरह हैंडल करते हैं, यह तरीका बहुत ही मायने रखता है। आज कई केस ऎसे सामने आते हैं, जिसमें पेरेंट्स बच्चों के बिहेव को ही नहीं जानते और बच्चे को क्या करना है, कैसा करना है खुद ही डिसाइड करते हैं। ऎसे में पेरेंट्स और बच्चों दोनों की एक साथ काउंसलिंग होना बहुत जरूरी है ताकि दोनों एक-दूसरे को समझ सकें।
आजादी दें
चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. ए.ए. पठान का कहना है कि बच्चा क्या करता है, क्या देखता है, किस तरह उसका ग्रुप है, यह सब जानकारी पेरेंट्स को होनी चाहिए। आज की स्थिति यह है कि पेरेंट्स को इन सब बातों की जानकारी नहीं है। पेरेंट्स को चाहिए की वो उसे अपनी निगरानी में बच्चों को थोड़ी आजादी दें। ताकि वे उसके मन को, इच्छा को समझें। अगर वो कुछ करना चाहता है तो उसे करने दें, अगर कुछ गलत है तो उसे सही तर्क के साथ समझाकर करने से मना करें। किसी तर्क के बिना किसी काम को करने से मना कर देने पर बच्चे पर नेगेटिव इफेक्ट पड़ता है।
कैरेक्टर बिल्डिंग एज में दें ध्यान
एसएमएस मेडिकल कॉलेज के साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रदीप शर्मा का कहना है कि बच्चों में 8 से 17 साल की उम्र कैरेक्टर बिल्डिंग एज कहलाती है। इस समय बच्चे बहुत ही फलेक्सिबल होते हैं। उनमें कई इमोशनल, बायोलॉजिकल और हार्मोनल चेंज आते हैं। इस वजह से बच्चों को इस पड़ाव में पेरेंट्स के सपोर्ट की बहुत जरूरत होती है। अगर उन्हें यह सपोर्ट नहीं मिलता तो इसका नेगेटिव इफेक्ट उनके मन और शरीर दोनों पर ही पड़ता है। विशेष्ाज्ञों का मानना है कि आज पेरेंट्स के बच्चों को टाइम नहीं देने के कारण बच्चे अधिकांश समय टीवी देखते हुए बीता रहे हैं। इस माध्यम से वो बहुत कुछ ऎसा सीख रहे हैं, जो इन्हें नहीं सीखना चाहिए।
पेरेंट्स हुए बिजी
पिछले कुछ समय से माता-पिता दोनों के जॉब करने का चलन बढ़ा है। इसका खामियाजा कहीं न कहीं बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। समाजशास्त्री सोहन लाल शर्मा का कहना है कि बच्चों के मन को समझना बहुत ही मुश्किल होता है। एक समय था जब बालमन को पेरेंट्स आसानी से समझ लेते थे, लेकिन आज वो भी खुद के कामो में ही इतना उलझ जाते हैं कि बच्चे के मन को समझने का न तो उनके पास वक्त होता है और न ही उसे समझने की इच्छा। आज एकल परिवार होने की वजह से भी बच्चे सिर्फ टीवी और दोस्तों के साथ ही समय बिता पाते हैं। आज स्थिति यह है कि बच्चों को घर के सदस्यों के साथ समय बिताने का मौका सप्ताह में एक या दो दिन ही मिल पाता है। यही कारण है कि बच्चों के मन में जब कोई गलत भावनाएं आती हैं तो वे उन भावनाओं के साथ ही जीने लगते हैं। जब यह भावनाएं बढ़ती हैं, तो वे डिप्रेशन-सुसाइड तक का रास्ता अपना लेते हैं।
बच्चों को समझना सीखें
प्राइमरी क्लास के स्टूडेंट्स को पढ़ा रही मोना खंडेलवाल ने बताया बच्चों की बातों और उनके नेचर को नोटिस करने से पता चलता है कि उनपर रियलिटी शो का कितना गलत असर पढ़ रहा है। कई बच्चे चाइल्ड आर्टिस्ट से खूद को कम्पेयर करते है और निराश हो जाते हैं। उन्हें इन भावनाओं से बाहर निकालने के लिए जरूरी है कि पेरेंट्स उन्हें समझे। बच्चों का जब रिजल्ट बिगड़ता है तो वो कम नंबर से दुखी नहीं होते बल्कि पेरेंट्स का रिएक्शन क्या होगा, इससे डर जाते हैं।
विजुअल मीडिया का असर
सीबीएसई गवर्निग बॉडी के मैम्बर अशोक गुप्ता का कहना है कि बच्चों पर विजुअल मीडिया गहरा इफेक्ट छोड़ता है। अगर बच्चा टीवी या मूवी में कोई नई चीज देखता है, तो उसकी चर्चा वो एक सप्ताह तक अपने पीयर ग्रुप में करता हुआ मिलता है। बच्चे कई बार जो टीवी पर देखते हैं, उसे अपनी लाइफ में करने की कोशिश भी करते हैं। यह एक इन मैच्योर बिहेव होता है। लेकिन पेरेंट्स इस बिहेव को किस तरह हैंडल करते हैं, यह तरीका बहुत ही मायने रखता है। आज कई केस ऎसे सामने आते हैं, जिसमें पेरेंट्स बच्चों के बिहेव को ही नहीं जानते और बच्चे को क्या करना है, कैसा करना है खुद ही डिसाइड करते हैं। ऎसे में पेरेंट्स और बच्चों दोनों की एक साथ काउंसलिंग होना बहुत जरूरी है ताकि दोनों एक-दूसरे को समझ सकें।
आजादी दें
चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. ए.ए. पठान का कहना है कि बच्चा क्या करता है, क्या देखता है, किस तरह उसका ग्रुप है, यह सब जानकारी पेरेंट्स को होनी चाहिए। आज की स्थिति यह है कि पेरेंट्स को इन सब बातों की जानकारी नहीं है। पेरेंट्स को चाहिए की वो उसे अपनी निगरानी में बच्चों को थोड़ी आजादी दें। ताकि वे उसके मन को, इच्छा को समझें। अगर वो कुछ करना चाहता है तो उसे करने दें, अगर कुछ गलत है तो उसे सही तर्क के साथ समझाकर करने से मना करें। किसी तर्क के बिना किसी काम को करने से मना कर देने पर बच्चे पर नेगेटिव इफेक्ट पड़ता है।
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